चढ़ मंच पर हल्ला यो मचाना तो छोडिये
हद हो गई अपने को जताना तो छोडिये.....
जिसको बनाने में दफ़न लाखो है जिन्दगी
ऐसे मंका को अपना बनाना तो छोडिये...
जेवर बना सोने को गलाया जो ताप में
खुद को उन्ही जेवर से सजाना तो छोडिये...
दिल है मगर दिलदार का नामो निशां नहीं
अच्छा है यहाँ दिल को लगाना तो छोडिये....
बैठे है यहाँ भेडिये इंशा की खाल में
आते हो नजर खुद को छुपाना तो छोडिये..
अब कौन दलालों से बचायेगा कौम को
मिल जायेगा जवाब बहाना तो छोडिये...
हर शख्स शख्शियत की परीधि मै कैद है
आ जायेगा यकीन भुलाना तो छोडिये....
"धीर" बदल जाएगी तस्वीर वतन की
कपास को कानो से लगाना तो छोडिये....
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