Sunday, October 25, 2026

छपकर जो बिकते थे अक्सर, अब बिकते बाजारों मे.

 कलम जहां सजदा करती है सत्ता और सरकारों मे..

झूठ जहां जमकर छपता है कुछ दल्ले अखबारों मे..

लोकतंत्र की बाते करना बस बेमानी लगता है..

डोल रही हो नैया जैसे, बीच किसी मझधारों मे..

दैनिक, डेली, पत्र, पत्रिका सौदागर सी लगती है..

छपकर जो बिकते थे अक्सर, अब बिकते बाजारों मे.

विज्ञापन का दर्जा देखों, बने मवाली नेताजी..

खबरों मे वो बने है अक्सर जो थे चोर हजारों मे..

सिक्कों से तय शब्द कलम के बोलो कैसे न्याय करें..

मौन रहो बस "धीर" यहां गुंगे बहरे दरबारों मे..


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Wednesday, October 14, 2026

गधा, घोडे सवार निकलेगा../

चुनावी मौसम है गुब्बार निकलेगा

मसला यू आर पार निकलेगा

राज जो छुपाये थे अरसे से

अब वो खुलकर बाजार निकलेगा

तोहमते और गिला शिकवा भी

बेवफा खास यार निकलेगा

वजूद क्या तेरे एहसानों का

भाई होकर भी गद्दार निकलेगा

कौन अपना है "धीर" करलो पता

हर गली से जो वार निकलेगा

इससे अच्छा है की खामोश रहे

गधा घोडे सवार निकलेगा


Saturday, October 10, 2026

देख तरक्की जलता होगा

 


मौन ये अक्सर‌ खलता होगा

कुछ तो अंदर पलता होगा

जब से उडना सीखा लिया है

कब पांवों पर चलता होगा

कल तक रिश्ते नाते सब थे

देख तरक्की जलता होगा

इस किस्मत‌ के खेल अनोखे

चढता सूरज ढलता होगा

बढी उम्र मे छूटे रिश्ते

कैसे वक्त निकलता होगा

ये दुनियां भी एक पगडंडी

गिरता कभी सम्भलता होगा

सब अपनी परिधि मे घिरे है

खुद को कौन बदलता होगा

मेरा दुःख बस "धीर" मेरा है

सुनकर कौन पिघलता होगा

Thursday, October 8, 2026

हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है

 परिंदे कब कहां किससे मौहब्त आजमाते है

सफर आकाश का है कब किसी से दिल लगाते है

यहां बस्ती मे बस मिलते गले है दिल नहीं मिलते

किया एतबार जिसपर बस्तियां वो ही जलाते है

वहम इतना सा है वो वक्त पर मुझको बचा लेगा

मेरे कातिल ही हाकिम बन दवस मुझको पिलाते है

रेत के ढेर पर नक्शा बनाते है बुलंदी का

हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है

बचाता मै रहा खुद को यहां जहरीले नागों से

धीर हर शख्स कातिल है यहां खुद को बचाते है



Saturday, September 26, 2026

चुनाव शहर मे

 गांव गली मे घूम रहे कुछ बगुले बने शहजादे से..

लगता है चुनाव शहर मे, हम शतरंज के प्यादे से..

कोरे वादे कोरी घोषणा‌ जुमलेबाजी कोरी है..

जैसे ये तो खास बनेऔर हम है बिलकुल सादे से..

लाखों का खेला है जुआ, माल करोड़ों खाने को..

जीत गये गर ये चुनाव तो, होंगे साहेब जादे से..

भांड मे जाये अपने वादे, कौन किसी का होता है...

जिनके वोटो से हम जीते, अब लगते वो आधे से...

लोकतंत्र के खेल अनोखे, लोक नहीं बस तंत्र यहां..

धवल भेष मे धीर देखलो, काले कलंक इरादे से..


Sunday, August 9, 2026

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है..

इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है..

वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते..

वो मिलते है उनसे ही जिनसे ये मिलाते..

चमचों ने उनके आगे एक दिवार बनादी..

सब खुश है उनके राज मे ये बात बतादी..

वो चिट्ठी दर चिट्ठी मे सुनाते है फसाना..

हाकिम हूं मै तो खुश है यहां सारा जमाना..

लेकिन यहां शहर के हालात अलग है..

सच्चाईयों पे पर्दे जज्बात अलग है..

सडके नहीं माकूल तो बिजली भी दफा है..

यहां कारखाने है मगर रोजगार कहां है..

सरकारी योजनाओं का मिलता ना वास्ता..

बिमारे अस्पताल सुनाता है दांस्ता..

स्कूल जो सरकारी है जर्जर से खडे है..

कब्जों के चलते पोखर सुखे ही पडे है..

हक है जो मुफलिशों का वो हर रोज खा रहे..

अपराधी कोतवाल ही थाने चला रहे..

भूमाफिया पटवारी क्या न्याय करेगा..

पद का दिखाके रौब बस वो जेब भरेगा..

सरपंच, जीलाधीश सब दल बल मे बंट गये..

रकबे सभी सरकारी थे सारे सिमट गये..

हाकिम जी मेरी आप से बस एक गुजारिश..

जनता की सुनों बात बिन चमचों की सिफारिश..

लाखों ने दिये वोट तो चमचों से क्या वफा...

दरबार से अपने  करो एक एक को दफा..

अर्जी है "धीर" की सुनो विस्वास बडा है..

होगा गजब विकास लिये आश खडा है...


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर "



Monday, June 1, 2026

आज के अखबारों का सच

 


झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे..

कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे..

रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हु‌ई जिम्मेदारी..

दब जाती है चीखे सारी, इन झूठे नक्कारों मे..

कल तक मेरा खौफ जबर था डरते हाकिम सारे थे..

अब तो खबरनवीस डराते, जो शामिल मक्कारों मे..

शोहरत के हर रुप से शोभित, अब विकृत स्वरूप हुआ..

विज्ञापन से जुबां बंद है क्या बोले चित्कारों मे..

सिक्कों से कलमें चलती है, स्याही का कुछ खेल नहीं..

धीर कहां अब डर लगता है, जनता के धिक्कारों मे..

धीरेन्द्र गुप्ता " धीर "

Thursday, May 14, 2026

अब रिश्तों मे पहले जैसी बात नहीं है...


अब रिश्तों मे पहले जैसी बात नहीं है..
हर रिश्तें बोझिल कोई जज्बात नहीं है..
अहम की चादर ओढ के बैठा हर अपना सा..
साथ चले बस रिश्ते, मन से साथ नहीं है..
छोटी छोटी बातों पर ही मन उलझे है..
जो अपने थे कल तक लेकिन आज नहीं है..
कल तक जो चेले थे आज गुरु बन बैठे..
आडम्बर है बस ज्ञानी कोई खास नहीं है..
किससे करु शिकायत, किससे मन सुलझाऊ..
मौन हुऐ सब "'धीर" कोई आवाज नहीं है..

Saturday, January 17, 2026

कटती ग‌ऊए तुम्हे पुकारे

 गौवंश के हालातो पर गौ वंश की पुकार.....


तर्ज़ : कस्मे वादे प्यार वफा सब

कटती गऊए तुम्हे पुकारे श्याम सलौने आओ रे

संकट में गौ वंश गोपाला आकर जान बचाओ रे

कटती ,,,,,,,,,

मूक हूँ मैं क्या बोलू तुमसे, तुम घट-घट के वाशी हो

मैं कटती हूँ हर घर कोने, चाहे अयोध्या कांशी हो 

है विस्वाश की सुन लोगे प्रभु, ना विस्वाश उठाओ रे

कटती ,,,,,,,,,,,

घुट - घुट कर सांसो में मेरा रुदन तड़फता रहता है

अपनों की दुत्कार से पीड़ित हृदय सिसकता रहता है

कब तक मौन रहोंगे कान्हा, अब ना देर लगाओ रे

कटती ,,,,,,,,,

गर्दन पर आरी से पहले, कितना मुझे सताते है

लाल रहे ये गोस्त हमारा, चमड़ी नरम बनाते है

पानी की हो गर्म बौछारें , ना इतना तड़फाओ रे

कटती ,,,,,,,,,,,

अब हृदय में,, धीर,, नहीं, गंभीर तुम्हे होना होगा

हिन्दू है गर खून से तो शमशीर तुम्हे होना होगा

गौ हत्यारों को बस फांसी ये कानून बनाओ रे

कटती ,,,,,,,,

Sunday, December 21, 2025

मै हूं अरावली सुनों मेरी..

 

मै मात्र नहीं पाषाण सुनो, मै हृदय धरा की धारा हूं..

मै मात्र नहीं पर्वतमाला, जनमानस की विस्तारा हूं..

मै हूं अरावली सुनों मेरी, मै आज सुनाने आई हूं..

हर काल खण्ड की गवाह हूं मै, ये तुम्हें बताने आई हूं..

मुझमें कितने ही वन, उपवन, मुझमें कितनी सरीता बहती..

कितने ही युद्ध हुऐ मुझमे, कितनी ही मै पीडा सहती..

कभी खनन, कभी भूचालो मे, कभी वर्षा कभी अधंकारो मे..

मैने खोया अपना स्वरुप, मानववृति अधिकारों में..

हर काल ने मुझको छला बहुत, उन्मुक्त विचारों ने मारा..

यहां बडे ख्यालों के छोटे, नेता, मक्कारों ने मारा..

मै वहीं अरावली सुनो जरा कितनों की जान बचाती हूं..

प्रचंड हवा के वेग चले मै ढाल खडी बन जाती हूं..

वर्षा जल की कलकल हो या, बहते झरनों की मधुर धारा..

झीलों का हूं ठहराव तो मै लाखों नदियों की विस्तारा..

राणा, सांगा, पृथ्वी, राठौड इन वीरों का इतिहास हूं मै..

मीरा, कर्मा की भक्ति तो मां पन्ना का बलिदान हूं मै..

रानी पदमनी, हाडा रानी लाखों जौहर का मान हूं मै..

दिल्ली, हरियाणा, गुजरात तो पावन राजस्थान हूं मै..

छोटी छोटी सी चोटी से, मै गुरु शिखर सा विशाल भी हूं..

मै घाटी और पठारों का, मनमोहक सुन्दर भाल भी हूं..

कैसे कद नापोगे मेरा, कितने हथियार चलाओंगे..

अस्तित्व मेरा ना शेष रहे, कितने कानून बनाओंगे..

पर यांद रखों इतना दुष्टों, मै पत्थर भर विस्तार नहीं..

तुम जैसे लाखों चले गये, पर मिटा मेरा आकार नहीं..

मै जिसदिन अपनी चीखों से खुद को आवाज लगाऊंगी..

कानून तुम्हारे पास रखों, मै खडी खडी इतराऊगी..

मेरे लाखों बेटे मुझपर, एक आंच नहीं आने देंगे..

अब धीर कटे चाहे ये सर, पर लाज नहीं जाने देंगे..

छपकर जो बिकते थे अक्सर, अब बिकते बाजारों मे.

 कलम जहां सजदा करती है सत्ता और सरकारों मे.. झूठ जहां जमकर छपता है कुछ दल्ले अखबारों मे.. लोकतंत्र की बाते करना बस बेमानी लगता है.. डोल रही ...