Sunday, August 9, 2026

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है..

इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है..

वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते..

वो मिलते है उनसे ही जिनसे ये मिलाते..

चमचों ने उनके आगे एक दिवार बनादी..

सब खुश है उनके राज मे ये बात बतादी..

वो चिट्ठी दर चिट्ठी मे सुनाते है फसाना..

हाकिम हूं मै तो खुश है यहां सारा जमाना..

लेकिन यहां शहर के हालात अलग है..

सच्चाईयों पे पर्दे जज्बात अलग है..

सडके नहीं माकूल तो बिजली भी दफा है..

यहां कारखाने है मगर रोजगार कहां है..

सरकारी योजनाओं का मिलता ना वास्ता..

बिमारे अस्पताल सुनाता है दांस्ता..

स्कूल जो सरकारी है जर्जर से खडे है..

कब्जों के चलते पोखर सुखे ही पडे है..

हक है जो मुफलिशों का वो हर रोज खा रहे..

अपराधी कोतवाल ही थाने चला रहे..

भूमाफिया पटवारी क्या न्याय करेगा..

पद का दिखाके रौब बस वो जेब भरेगा..

सरपंच, जीलाधीश सब दल बल मे बंट गये..

रकबे सभी सरकारी थे सारे सिमट गये..

हाकिम जी मेरी आप से बस एक गुजारिश..

जनता की सुनों बात बिन चमचों की सिफारिश..

लाखों ने दिये वोट तो चमचों से क्या वफा...

दरबार से अपने  करो एक एक को दफा..

अर्जी है "धीर" की सुनो विस्वास बडा है..

होगा गजब विकास लिये आश खडा है...


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर "



Monday, June 1, 2026

आज के अखबारों का सच

 


झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे..

कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे..

रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हु‌ई जिम्मेदारी..

दब जाती है चीखे सारी, इन झूठे नक्कारों मे..

कल तक मेरा खौफ जबर था डरते हाकिम सारे थे..

अब तो खबरनवीस डराते, जो शामिल मक्कारों मे..

शोहरत के हर रुप से शोभित, अब विकृत स्वरूप हुआ..

विज्ञापन से जुबां बंद है क्या बोले चित्कारों मे..

सिक्कों से कलमें चलती है, स्याही का कुछ खेल नहीं..

धीर कहां अब डर लगता है, जनता के धिक्कारों मे..

धीरेन्द्र गुप्ता " धीर "

Thursday, May 14, 2026

अब रिश्तों मे पहले जैसी बात नहीं है...


अब रिश्तों मे पहले जैसी बात नहीं है..
हर रिश्तें बोझिल कोई जज्बात नहीं है..
अहम की चादर ओढ के बैठा हर अपना सा..
साथ चले बस रिश्ते, मन से साथ नहीं है..
छोटी छोटी बातों पर ही मन उलझे है..
जो अपने थे कल तक लेकिन आज नहीं है..
कल तक जो चेले थे आज गुरु बन बैठे..
आडम्बर है बस ज्ञानी कोई खास नहीं है..
किससे करु शिकायत, किससे मन सुलझाऊ..
मौन हुऐ सब "'धीर" कोई आवाज नहीं है..

Saturday, January 17, 2026

कटती ग‌ऊए तुम्हे पुकारे

 गौवंश के हालातो पर गौ वंश की पुकार.....


तर्ज़ : कस्मे वादे प्यार वफा सब

कटती गऊए तुम्हे पुकारे श्याम सलौने आओ रे

संकट में गौ वंश गोपाला आकर जान बचाओ रे

कटती ,,,,,,,,,

मूक हूँ मैं क्या बोलू तुमसे, तुम घट-घट के वाशी हो

मैं कटती हूँ हर घर कोने, चाहे अयोध्या कांशी हो 

है विस्वाश की सुन लोगे प्रभु, ना विस्वाश उठाओ रे

कटती ,,,,,,,,,,,

घुट - घुट कर सांसो में मेरा रुदन तड़फता रहता है

अपनों की दुत्कार से पीड़ित हृदय सिसकता रहता है

कब तक मौन रहोंगे कान्हा, अब ना देर लगाओ रे

कटती ,,,,,,,,,

गर्दन पर आरी से पहले, कितना मुझे सताते है

लाल रहे ये गोस्त हमारा, चमड़ी नरम बनाते है

पानी की हो गर्म बौछारें , ना इतना तड़फाओ रे

कटती ,,,,,,,,,,,

अब हृदय में,, धीर,, नहीं, गंभीर तुम्हे होना होगा

हिन्दू है गर खून से तो शमशीर तुम्हे होना होगा

गौ हत्यारों को बस फांसी ये कानून बनाओ रे

कटती ,,,,,,,,

Sunday, December 21, 2025

मै हूं अरावली सुनों मेरी..

 

मै मात्र नहीं पाषाण सुनो, मै हृदय धरा की धारा हूं..

मै मात्र नहीं पर्वतमाला, जनमानस की विस्तारा हूं..

मै हूं अरावली सुनों मेरी, मै आज सुनाने आई हूं..

हर काल खण्ड की गवाह हूं मै, ये तुम्हें बताने आई हूं..

मुझमें कितने ही वन, उपवन, मुझमें कितनी सरीता बहती..

कितने ही युद्ध हुऐ मुझमे, कितनी ही मै पीडा सहती..

कभी खनन, कभी भूचालो मे, कभी वर्षा कभी अधंकारो मे..

मैने खोया अपना स्वरुप, मानववृति अधिकारों में..

हर काल ने मुझको छला बहुत, उन्मुक्त विचारों ने मारा..

यहां बडे ख्यालों के छोटे, नेता, मक्कारों ने मारा..

मै वहीं अरावली सुनो जरा कितनों की जान बचाती हूं..

प्रचंड हवा के वेग चले मै ढाल खडी बन जाती हूं..

वर्षा जल की कलकल हो या, बहते झरनों की मधुर धारा..

झीलों का हूं ठहराव तो मै लाखों नदियों की विस्तारा..

राणा, सांगा, पृथ्वी, राठौड इन वीरों का इतिहास हूं मै..

मीरा, कर्मा की भक्ति तो मां पन्ना का बलिदान हूं मै..

रानी पदमनी, हाडा रानी लाखों जौहर का मान हूं मै..

दिल्ली, हरियाणा, गुजरात तो पावन राजस्थान हूं मै..

छोटी छोटी सी चोटी से, मै गुरु शिखर सा विशाल भी हूं..

मै घाटी और पठारों का, मनमोहक सुन्दर भाल भी हूं..

कैसे कद नापोगे मेरा, कितने हथियार चलाओंगे..

अस्तित्व मेरा ना शेष रहे, कितने कानून बनाओंगे..

पर यांद रखों इतना दुष्टों, मै पत्थर भर विस्तार नहीं..

तुम जैसे लाखों चले गये, पर मिटा मेरा आकार नहीं..

मै जिसदिन अपनी चीखों से खुद को आवाज लगाऊंगी..

कानून तुम्हारे पास रखों, मै खडी खडी इतराऊगी..

मेरे लाखों बेटे मुझपर, एक आंच नहीं आने देंगे..

अब धीर कटे चाहे ये सर, पर लाज नहीं जाने देंगे..

Saturday, November 1, 2025

दोस्तों के कारनामें देखकर

 


दोस्तों के कारनामें देखकर

दुश्मनों से दिललगी सी हो ग‌ई..

कौन है अपना इसी तलाश मे

खर्च सारी जिन्दगी सी हो ग‌ई..

उस दवा पर हो भला कैसा यकीं

जख्म जो देती है उम्र भर का..

अब मेरी है विषधरों से दोस्ती

विषधरों से बंदगी सी हो ग‌ई..

उन उजालों का भला मै क्या करु

जो सदा चुभते रहे इन आंखों मे..

घुप अंधेरो ने मिटाई तिशनगी

स्याह राते हमनशी सी हो ग‌ई है..

शहर के हाकिम ही थे शातिर बडे

मर्ज से हटकर दवा देते रहे..

था यकीं तो "धीर" बस इक मौत पर

जिन्दगी तो बेबसी सी हो ग‌ई है..

Thursday, October 30, 2025

कण्ठ से शंकर जो नीले हो गये थे शिव मेरे


 अमृत की खोज मे विषपान का उल्लेख है

जो गरल को पी गया समझो वही तो श्रेष्ठ है

सागर मथन से क्या मिला एक बार जानलो जरा

अमृत तो बस कलश मे था आगाध था जो विष भरा

ओर भी सुन्दर सजीले हो गये थे शिव मेरे

कण्ठ से शंकर जो नीले हो गये थे शिव मेरे

दूसरे के कष्ट को महसूस जो दिल से करे..

है सिद्ध से भी सिद्धतम उपकार जो सबपर करे..

जो किसी की देख पीडा, किंचित विचलित हो गया..

आंख के हर आंशुओं, पीडाओं मे जो बह गया..

मानलो वो ही तो शिव है, मन शिवालय हो गया..

धीर वो महादेव है‌ बस जो गरल को पी गया

Monday, July 21, 2025

सीढियां जो भी लगी थी, कामयाबी दौर मे..


 सीढियां जो भी लगी थी, कामयाबी दौर मे..

बस बचाकर उनको रखलो डूबती हर भौर मे..

जब बुलंदी का सितारा डूबने पर आयेगा..

काम आयेगी तेरे एक हमसफर के तौर पे..

कुछ बुलंदी देख ठोकर से गिरादे सीढियां..

गिरते है सीधे फलक से कौसती है पीढियां..

कांधों पर जिनके तेरी हर सुर्खियों का बोझ था..

तेरी शोहरत से ही जिनके चेहरे भर पर ओज था..

आज वो तुझको भले ही अदने से आये नज़र..

जिनकी राहों से लिपट तू पार करता हर डगर..

देखना एक रोज शोहरत खाक मे मिल जायेगी..

जिन्दगी जब लौट के वापस वही पर आयेगी..

ढूंढता रह जायेगा तू मुफलसी के हर वो पल..

बस अकेला पायेगा होकर जमाने मे विफल..

शोहरतों के दौरे मद मे जिनको ठुकराता गया..

खोके सारी सीढियां हर साख तू पाता गया..

लेकिन बचा के गर जो रखता सीढियां उस दौर की..

काम‌ आती अब तेरे वो पीढियां उस दौर की..

जीन्दगी के चक्र मे पाकर सवेरा खो‌ गया..

भूल ढलती सांझ को वो बस रंगीला हो गया..

"धीर" सुख दुःख का तकाजा किस्मती अहसास है..

जीत उसकी है सदा अपने जो आसपास है..


Thursday, July 3, 2025

हमने अक्सर चोटे खाई


 हमने अक्सर चोटे खाई, अपने ही  रखवालों से..

गले लगाकर खूब दुलारा, मिला जो मतलब वालों से..

खुदगर्जी के पेड घने है, जंगल द्वेष  विकारों का..

बोलों कैसे खुद को बचाता, चुभते रोज सवालों से..

अब चंदन भी हुआ विषैला, लिपटे काल भुजंगो से..

कैसे सच लडता झूठों से, हार गया नक्कालों से..

सर शैया पर भिष्म पडे है, चाल शिखंडी चलते है..

महाभारत का रण सृजित है इन्द्रप्रस्थ मोहजालों से..

वीरों की महफिल मे अक्सर चीर हरण हो जाते है..

अभिमन्यु बलिदान हुऐ है, राजनीतिक हर चालों से..

हर युग के प्रतिमानों पर जयचंदो की गद्दारी है..

कितने अकबर मारे जाते महाराणा के भालों से..

खामोशी की पगडंडी पर " धीर" गजब कोलाहल है..

मौन स्वीकृति की उलझन मे, मै उलझा हूं सालों से..

Friday, June 20, 2025

आंसू


आंख से बहते हर आंसू, मन की पीडा हर लेते है..

बस शब्दों का मौन है रहता, बाकी सब कह लेते है..

जब से सफल हुऐ है अपने, मानों कोसो दूर हुऐ..

मेरे आंसू बस मेरे है, मेरे संग ही बह लेते है..

अंतर्मन का बनके आईना, साथ निभाते जीवन भर..

मेरे हर गम और खुशियों को, आत्मसात सा कर लेते है..

नहीं शिकायत ना कोई शिकवा,ना द्वेष तुमसे,ना ही गिला है..

बस एक तुमसे हमारी यारी, तुम्हीं से दिल की कह लेते है..

टपक ना जाये ये व्यर्थ आंसू, है धीर इतना ख्याल मुझको..

कसम तुम्हारे लिये जिगर पर, जमाने भर की सह लेते है..

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है.. इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है.. वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते.. वो मिलते है उनसे ही जिनस...