झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे..
कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे..
रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हुई जिम्मेदारी..
दब जाती है चीखे सारी, इन झूठे नक्कारों मे..
कल तक मेरा खौफ जबर था डरते हाकिम सारे थे..
अब तो खबरनवीस डराते, जो शामिल मक्कारों मे..
शोहरत के हर रुप से शोभित, अब विकृत स्वरूप हुआ..
विज्ञापन से जुबां बंद है क्या बोले चित्कारों मे..
सिक्कों से कलमें चलती है, स्याही का कुछ खेल नहीं..
धीर कहां अब डर लगता है, जनता के धिक्कारों मे..
धीरेन्द्र गुप्ता " धीर "
