अपना अपना नसीब है प्यारे
कौन कितना करीब है प्यारे........
चंद पाकर भी इबादत खुदा से करता है
कोई दिल से गरीब है प्यारे....
सच से डरते है कभी हौसला नहीं करते
आदमी कितने अजीब है प्यारे.....
रोज देते है दगा और सितम करते है
फिर भी कितने शरीफ है प्यारे......
पांच पांडव से है खामोश ये बस्ती वाले
हो रहा चीरहरण बदनसीब है प्यारे.........
"धीर" चाहता हूँ सुनाऊ कुछ दिल की अपनी
कौन अपना रकीब है प्यारे...........
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