Friday, December 10, 2010

बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या..........

                                            
          इस शहर के दुकंदारो सुनलो जरा, बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या
         माँ का आँचल बहन की हरी चूड़िया, बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या....


    आज हिरसो-हवस की ये मंडी सजी, बोलिया लग रही है यूं ईमान की
    जिस्म बिकता है और बिक रहा है धर्म, ढुंढता हूँ मै पहचान इंसान की
    सजदे मुल्लाओ के पंडितो के भजन,बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या .............

             
मांग का बेच सिन्दूर बच्चे पले,वो अभागन ज़माने मारी हुई   
रोज बिकती थी हसरत के बाजार में, जीत कर भी अभागन वो  हारी हुई
बेबसी, भूख, आँखे वो पानी से तर, बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या......


  भूख ने आज सिखला दी हुशियारी सब, रोटिया चाँद बच्चो को आता नजर
  भूख से बिलबिलाते वो करते भी क्या,बांध लेते थे कसकर वो अपना उदर
   वो सपने सजीले वो परियो के घर, बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या........


 बिक रहा है चलन बिक रही है दुल्हन, बिक रही है सुहागो की राते यहाँ
 बेच डालेगे हम देश को देखना, "धीर"लगती है दिन रात घाते यहाँ 
 ये अर्थी कफ़न और ये सांसे मेरी, बेचता हूँ मै सौदा खरीदोगे क्या..........

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