कलम जहां सजदा करती है सत्ता और सरकारों मे..
झूठ जहां जमकर छपता है कुछ दल्ले अखबारों मे..
लोकतंत्र की बाते करना बस बेमानी लगता है..
डोल रही हो नैया जैसे, बीच किसी मझधारों मे..
दैनिक, डेली, पत्र, पत्रिका सौदागर सी लगती है..
छपकर जो बिकते थे अक्सर, अब बिकते बाजारों मे.
विज्ञापन का दर्जा देखों, बने मवाली नेताजी..
खबरों मे वो बने है अक्सर जो थे चोर हजारों मे..
सिक्कों से तय शब्द कलम के बोलो कैसे न्याय करें..
मौन रहो बस "धीर" यहां गुंगे बहरे दरबारों मे..
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