Thursday, October 8, 2026

हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है

 परिंदे कब कहां किससे मौहब्त आजमाते है

सफर आकाश का है कब किसी से दिल लगाते है

यहां बस्ती मे बस मिलते गले है दिल नहीं मिलते

किया एतबार जिसपर बस्तियां वो ही जलाते है

वहम इतना सा है वो वक्त पर मुझको बचा लेगा

मेरे कातिल ही हाकिम बन दवस मुझको पिलाते है

रेत के ढेर पर नक्शा बनाते है बुलंदी का

हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है

बचाता मै रहा खुद को यहां जहरीले नागों से

धीर हर शख्स कातिल है यहां खुद को बचाते है



हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है

 परिंदे कब कहां किससे मौहब्त आजमाते है सफर आकाश का है कब किसी से दिल लगाते है यहां बस्ती मे बस मिलते गले है दिल नहीं मिलते किया एतबार जिसपर ...