परिंदे कब कहां किससे मौहब्त आजमाते है
सफर आकाश का है कब किसी से दिल लगाते है
यहां बस्ती मे बस मिलते गले है दिल नहीं मिलते
किया एतबार जिसपर बस्तियां वो ही जलाते है
वहम इतना सा है वो वक्त पर मुझको बचा लेगा
मेरे कातिल ही हाकिम बन दवस मुझको पिलाते है
रेत के ढेर पर नक्शा बनाते है बुलंदी का
हवा के रुख यहां हर शाख को बनते गिराते है
बचाता मै रहा खुद को यहां जहरीले नागों से
धीर हर शख्स कातिल है यहां खुद को बचाते है

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