मौन ये अक्सर खलता होगा
कुछ तो अंदर पलता होगा
जब से उडना सीखा लिया है
कब पांवों पर चलता होगा
कल तक रिश्ते नाते सब थे
देख तरक्की जलता होगा
इस किस्मत के खेल अनोखे
चढता सूरज ढलता होगा
बढी उम्र मे छूटे रिश्ते
कैसे वक्त निकलता होगा
ये दुनियां भी एक पगडंडी
गिरता कभी सम्भलता होगा
सब अपनी परिधि मे घिरे है
खुद को कौन बदलता होगा
मेरा दुःख बस "धीर" मेरा है
सुनकर कौन पिघलता होगा

No comments:
Post a Comment