Tuesday, February 14, 2023

चुप रहना ही समाधान यहां..

 गिरगिट से रंग बदलती है, इंसानों की पहचान यहां..

रिश्तें है रेल की पटरी से, संग चलकर भी अंजान यहां..

व्यक्तित्व बचा कहां व्यक्ति का, बदले बदले हालात हुऐ..

अपनी पहचान बचाने को, लिये फिरता हथेली जान यहां..

समझौता कैसे कर पाता अपने सिद्धांत उसूलों का...

चंद सिक्कों मे बिकते देखा जब लाखों का ईमान यहां..

बेईमान हजारों बैठे है सत्ता के इन गलियारों मे..

अपमानित होता लोकतंत्र, कुपात्रों का सम्मान यहां..

दादुर वक्ता के मध्य भला कैसे अपनी कोई बात रखें..

बस " धीर" खामोशी है काफी, चुप रहना ही समाधान यहां..

Wednesday, February 1, 2023

ख्वाबों मे सजाले कोई

आज की रात मेरा दर्द चुरा‌ ले कोई..*

*चंद लम्हों के लिये अपना बनाले कोई..*

*तीर हूं लौट के तरकश मे नहीं आऊंगा..*

*मै नजर मे हूं निशाना तो लगाले कोई..*

*राख हूं, खाक हूं उम्मीद हूं एक टूटी हुई..*

*मै संवर जाऊंगा ख्वाबों मे सजाले कोई..*

*तेरी खुश्बु मेरी यांदों से क्यो नही जाती..*

*जैसे अहसास हवाओं का बहा ले कोई..*

*बेडा दरियां के किनारों पे आ डूबा बैठे हम..*

*बैठे जिस डाल पे आरी‌ यूं चलाले कोई..*

*मेरा मुर्शिद ही मेरी जान का दुश्मन निकला..*

*बडी आफत मे पडी जान बचाले कोई..*

*"धीर" कौडी मे बिके लाख मे बिकने वाले..*

*जैसे हस्ती सरेबाजार  मिटाले कोई..*


*धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"*

9414333130

अभिमन्यु मारे जाते है...

*कुचक्र सदा घेरे रहते अपने ही घात लगाते है..*

*यहां चक्रव्यूह की रचना मे अभिमन्यु मारे जाते है..*

*नर महता के आगे अक्सर पंचाली पर ही दांव लगे..*

*यहां भरी सभा मे चीरहरण अक्सर स्वीकारे जाते है..*

*शर शैया लेटे भिष्म विवश गुरु द्रोण कुचक्र चलते हो..*

*वहां बर्बरीक से अदम्य वीर छल मे ही वारे जाते है..*

*जिद के आगे पंचाली के लाशों के ढेर लगे भारी..*

*छल, कपट, दम्भ से विवश वीर बेमौत संहारे जाते है..*

*है इन्द्रप्रस्थ सी मोहमाया लक्षाग्रह से षडयंत्र यहां..*

*अनुशासन सुचिता पे अक्सर अवसर भारी पड जाते है..*

*अंधे के अंधे होते है जहरीले शब्द  कटीले से..*

*मर्यादा खोते शब्द यहां महाभारत ही करवाते है..*

*अपने बैठे हो अपनों पर पल पल जो घात लगाने को..*

*पासों की चालों से शकुनि कौरव कुल को मरवाते है..*

*अज्ञात वाश से जीवन मेवअपनी पहचान छुपाले जो..*

*वो " धीर" श्रेष्ठ योद्धा जग मे इतिहास गिनाये जाते है..*


*धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"*

9414333130

रावण को पलते देखा है...

मैने रावण के हाथों रावण को जलते देखा है..

कलियुग मे सीता को अक्सर श्रीराम ही छलते देखा है..

अब सभी जटायु मौन हुऐ सीता को कौन बचायेगा..

मैने हर गली चौराहे पर रावण को‌‌ पलते देखा है..

बाली मिलते है गली गली सुग्रीव की नारी हरने को..

नारी को समझ खिलौना सा बालक सा मचलते देखा है..

अंगद जैसे अब वीर कहां वो साहस कहां से लाओगें..

बन दूत टिकाये चरण कमल सिहांसन हिलते देखा है..

हनुमान सी भक्ति का जग मे दूजा ना कोई उदाहरण है..

सोने की सुन्दर लंका को अग्नि मे सिमटते देखा है..*

सुर्पनखा के यौवन से किंचित भी ना भटकाव हुआ.*

त्रिया के चरित्र विफल देखे बस नाक को कटते देखा है..*

अरिदल मे बैठा वीभीषण अपनों पर दांव लगाने को..*

इतिहास गवाह है कुल नाशक इतिहास बदलते देखा है.*

यहां "धीर" बदलते हर युग में नारी की अग्नि परीक्षा है..*

कानाफूसी परिपाटी पर  श्रीराम को चलते देखा है..*


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

9414333130

खंजर भी साथ रखते है...

दोगले लोग है बातों मे बात रखते है..

गले मिलते है तो खंजर भी साथ रखते है..

सुना है शहर की गलियां भी तंग होने लगी..

फासले दरमियां ही आस पास रखते है..

बिमार था मुझे दवा की जगह जख्म दिये..

यार कुछ ऐसे भी जिगरी है खास रखते है..

खैरियत पूछते है‌ दर्द ही देने वाले..

काले दिल है जुबानी मिठास रखते है..

मेरी तलाश मे हमराज ही मेरा निकला..

छुपा के दिल मे हजारों ही राज रखते है..

कैसे पहचानता फितरत छुपे नकाबों की..

इतने शातिर है की बदली आवाज रखते है..

मृगमारीच मे फंसकर बडे हैरान से है..

"धीर" उलझन मे भी होशो हवास रखते है..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

9414333130

मेरी मां

मेरी हर गलतियों को मां

हमेशा टाल देती है..

गिले शिकवे हजारों दिल से 

मां निकाल देती है..

यहां उलझन हजारों है

पकड के अंगुलीयां मेरी..

मै गिरता हूं मुझे हर हाल‌

मां सम्भाल लेती है...

कदम गर लडखडाएं जो

मेरी मां साथ रहती है..

बडी सिद्दत से मां बच्चों ‌को 

अपने पाल लेती है..

मुसीबत लाख हो सर पर

मुझे चिन्ता नहीं रहती..

वो अपने आप से हर 

मुश्किलों को ढाल लेती है..

उम्र के पायदानों से " धीर"

बूढा नहीं होता..

थकावट मे मेरी मां चूम‌

जो मेरा भाल लेती है..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

9414333130

जाती के जंजाल....

तुम जाती के जालों मे 

अटके हो कीट पतंगों से..

जाती के दलदल मे भटके 

हो बुद्धिहीन मलंगों से..

हर पंचवर्ष की बारिश मे 

मेढक जो बाहर आते है..

जो कभी हुऐ ना जाती के 

वो जाती के गुण गाते है..

जिनका सारा जीवन गुजरा 

भाई से भाई लडाने मे..

वो बनके हितैषी आ टपके 

वोटो की चोट लगाने मे..

अचरज है शिक्षाहीन यहां 

शिक्षित तक को भरमाते है..

मुर्ख बन बुद्धिमान यहां 

जाती की रटन लगाते है..

सब जानते है ये जहर 

हमें विकसित कब होने देता है..

जाती के चक्कर मे वोटर 

कांटे ही बोने देता है..

बेटी रोटी के नाते मे जाती 

का मान जरूरी है..

लेकिन जब चयन करो नेता 

तो होना ज्ञान जरुरी है..

जातिवादी परिपाटी मे 

विकास अवरुद्ध हो‌ जाता है..

जनता के हक का पैसा ही 

नेता बस लूट के खाता है..

अज्ञानी ओर बेदम नेता 

सत्ता का हवाला देते है..

सरकार हमारी अभी नहीं 

हर बार बहाना देते है..

बस " धीर" कहे इतना सुनलो 

निकलो जाती के जालों से..

दल,बल, जाती का मोह त्याग 

हम जोडे हाथ दलालों से..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

9414333130



Thursday, December 29, 2016

मेरा ‌प्रथम ‌काव्य ‌संग्रह - ‌मेरे ‌गम ‌मेरी ‌खुशियां


2001 मे जारी भजन एलबम - बिगडी बना दो सांवरा


‌द्वितिय ‌काव्य ‌संग्रह:- ‌मेरी ‌मन ‌व्यथा


जीवन ‌कृति

‌जीवन के लम्बे अभिनय मे अनेकों किरदारों को निभाया। कभी गायन तो कभी साहित्य सृजन तो कभी पत्रकारिता जैसे चुनौती पूर्ण कार्य की कसौटी । हर बार ,हर रुप मे मुझे आपका सहयोग, आशीष, प्रेम सतत, अविरल मिलता रहा। आप सभी का आभार एवं मेरी कृति आपको समर्पित ।

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है.. इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है.. वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते.. वो मिलते है उनसे ही जिनस...