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आज के अखबारों का सच
झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे.. कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे.. रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हुई जिम्मेदारी.. ...
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वो मयखाने के पैमाने में सब खुशिया लुटा बैठा भरी मांगे,खनकती,चूडिया, बिंदिया लुटा बैठ...
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हमने अक्सर चोटे खाई, अपने ही रखवालों से.. गले लगाकर खूब दुलारा, मिला जो मतलब वालों से.. खुदगर्जी के पेड घने है, जंगल द्वेष विकारों का.. ब...

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