असर खानदानी, दिखा रहे है
गधे शेर खुद को, बता रहे है
जिन्हें पाला पोसा खिलाया निवाला
औकात अपनी वो जता रहे है
वहम के जो पर्दे पडे थे अक्ल पर
वो इक इक यूं सारे हटा रहे है
जहां हमने थूका वहां तुमने चाटा
यहां बौने कद अपना बढा रहे है
वर्षों लगेंगे हुनर सीखने मे
बराबरी पर जो आ रहे है
कलम धीर जिनको पकडना सिखाया
वो मेढक कुएं के है टर्रा रहे है
