Saturday, June 17, 2023

आज के हालात...

 राजनीत के कपट खुले है,चाले कुलषित कालों की..

इस दुनियां मे आडम्बर है,जय बोलों नक्कालों की..

सच्चाई पे लाखों पर्दे,झूठ अदब से चलता है..

गीता की सौगंधों पर ज्यो,जज फरमान बदलता है..

सिहांसन की टनकारों से,आसन तक झुकते देखा..

मैने सच को चौराहे पर,सरेआम बिकते देखा..

जो कहते बेमोल है हम,सौदा उसका हो जाता है..

ऐसे हालत हुऐ जगत के,अब बाढ खेत को खाता है..

बदमाशों मे खौफ भरा था, अक्सर जिन जिन थानों का..

आज दरोगा बन बैठा वो, मुजरिम था जो सौ जानों का..

कलम चले सिक्को की खन से,अखबारों का हाल‌ बुरा..

सच से चैनल दूर है कोसों, किसे सुनाएं कौन खरा ?

संसद की मर्यादा को , छलनी होते देखा होगा..

अमर्यादित भाषाओं से, कुलषित होते देखा होगा..

मैने आक्रोश के नामों पर, ट्रेनों को जलते देखा है..

मजबूर हुऐ प्रशासन को, घुटनों पर चलते देखा है..

शिक्षा की दुकानों पर मैने, विद्या का सौदा देख लिया..

मस्जिद की चार मिनारों से, नफरत का मसौदा देख लिया

शाहिन बाग की हठधर्मी, उन्माद धर्म‌ के नामों पर,

 मैने कश्मीर मे देखा है, कटते इंसान को राहों पर..

शिक्षक को अपनी शिष्या से, कर काम कलंकित देख लिया..

बेटी को छलते पिता मिले, रिश्तो को बदलते देख लिया..

कलियुग की अदभुत महिमा है,सब रंग निराले देख लिये..

बदले मौसम की रवानी मे, सब ढंग निराले देख लिये..

बस " धीर" तमन्ना है इतनी, सुख, चैन, अमन का वाश रहें..

मै रहूं ना रहूं लेकिन मेरे,भारत का सदा विकास रहे..

Tuesday, June 13, 2023

बेटी करें‌ पुकार......

बेटी करे पुकार माँ हिम्मत हारो ना

मैं भी अंश हूँ तेरा माँ, मुझे मारो ना 

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

धवल भेष में छुपे हुए हत्यारो ने 

ऐसा जुर्म किया जग के गद्दारो ने 

हुआ कलंकित पेशा ये, स्वीकारो ना 

मैं भी ,,,,,,,,,,,,,,,,

तू जैसे रक्खेगी माँ मैं रह लुंगी 

सदा रहे खुशहाल तू, दुःख मैं सहलुंगी

महकेगा आँगन घर का धिक्कारो ना 

मैं भी,,,,,,,,,,,,,,

माना बापू लाख ये ताना मारेंगे 

पढ़ लिख कर कुछ बन जाउंगी मानेंगे 

समय बड़ा बलवान है माँ दुत्कारो ना 

मैं भी,,,,,,,,,,,

दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती सब बेटी है 

लेकिन आज नसीबो कि वो हेटी है 

नारी है केवल श्रद्धा ललकारो ना 

मैं भी,,,,,,,,,,,

जिस घर बेटी का होता, सम्मान नहीं 

धन,विद्या, शक्ति का जिस घर मान नहीं 

वो घर नरक समान`` धीर`` पहचानो ना

मैं भी,,,,,,

धीरेन्द्र गुप्ता`` धीर``

Sunday, June 11, 2023

उजियारों को नजर लगी है

 पढना है तो खुद को पढलों,

मृग मारीचा छोड जरा..

सब दुनियां की भूल भुलैयां 

कौन है खोटा कौन खरा..

मतलब के मोहजाल निगलते 

सम्बंधों की परिपाटी..

उजियारों को नजर लगी‌ है 

अंधिकारों से जगत भरा..

"धीर"

छोड दे...

 दूसरों के कद पे लहजा यूं लगाना छोड दे

बेवक्त ही गिर जायेगा यूं डगमगाना छोड दे

चाहे थोडी रख मगर पहचान अपनी चाहिये

अपने चेहरे पर यूं चेहरा अब लगाना छोड दे

"धीर"

Saturday, June 10, 2023

कौन देता है....

 यहां जीवन को बाहों का सहारा कौन देता है..

भरे मझदार मे कश्ती किनारा कौन‌‌ देता है..

मौत के बाद दावत है जश्न भी है जुलुस भी है..

जो मरते भूख‌ से बच्चे, निवाला कौन‌ देता है..

देखकर हाथ मे अपनी लकीरे सोचता होगा..

बिना किस्मत मजे से हो‌ गुजारा कौन‌ देता है..

अलेदा है मेरी किस्मत हजारों खुशनसीबों से..

"धीर" बस रंज इतना है, इशारा कौन देता है...

Friday, June 9, 2023

मेरा शाहजहांपुर

हाईवे के इस तरफ ओर उस तरफ मेरा गांव है..

नाम शाहजहांपुर है जिसका, बस सुनहरी छांव है..

डाक बंगले की अदा, यहां कारखानों का चलन..

इन्द्रा कॉलोनी मे बसता एक भारत एक स्वप्न..

इसके उत्तर मे है भैरु, वृन्दावन खण्डर अजब..

कुछ कदम के वृक्ष ओर श्री कृष्ण की गाथा गजब..

पश्चिम दिशा मे रायसर तालाब की महिमा सुनो..

पर्वतों से आ रहे बरसाती नाले की सुनो...

गंगा, शिव, श्री श्याम का मन्दिर श्रद्धा का केन्द्र है...

आस्था प्रबल हजारो बस कृपा का केन्द्र है..

पूर्व  नारेहडा सरोवर एक बडा उद्यान है..

शिव कृपा का केन्द्र पोखरदास का स्थान है..

दक्षिण दिशा मे संत जोधा भगत जी का धाम है..

भगतो की बिगडी बनाना ही तो उनका काम है..

मीणाओं की जोहडी से जल संचय पुरानी रीत है..

बाल्मिक मन्दिर  निकट ही सांवरे की प्रीत है..

श्याम मन्दिर भव्य लाखों आस्था का नाम है..

जो यहां सर को झुकाता बनता उसका काम है...

दक्षिण दिशा के छोर पर ही जीण माता का भवन..

चारों दिशाये पावनी ऊंची हवेली और भवन...

मन्दिर गोपालदास का श्रद्धा अटल विस्वास है..

मेला गजब शिवरात्रि सदभाव की मिसाल है..

मन्दिर बिहारी जी का, ठाकुर जी यहां विद्यमान है..

भूरा सिद्ध शनिदेव की महिमा बडी महान है..

शंकर चौराहे के है शंकर, देवो मे सिरमौर है..

शीतला माता की महिमा गुंजती चहुंओर है..

पाठशाला का भवन गढ है पुरानी आन का..

प्राचीन शाहजहांपुर का गौरव, एकता ओर शान का..

है पुरातन नाम लुहानाखेडा इतना जानलो..

मुगलो की सेना से भीडे थे वीर बस पहचानलो..

दिल्ली सिहांसन को जो सीधे आन पर ललकार दे..

चंद गुर्जर वीर मिल दुश्मन को पल संहार दे..

विद्यालय का ये भवन, गढ हल्दिया महाराज का..

चार बुर्जों पे टिका प्रतीक था स्वराज का..

ईदगाह मस्जिद मिनारे गढती यहां सदभाव है..

मजहबी ना द्वेष किंचित एकता का भाव है..

बस गुजारिश है यही सदभाव सम बना रहे..

आदमी से आदमी का प्रेम बस घना रहे..

माना की कुछ विकार अब मनभाव मे आने लगे..

छोड दो रंजिश नये अरमान सब भाने लगे..

आओ हम संकल्प ले गौरव ना झुक ना पायेगा..

स्वर्ग सी पावन धरा का प्रताप रुक ना पायेगा..

जो सबल है वो मेरे संकल्प से जुड जायेगा..

वो पुराने दिन समय सब लौट कर आ जायेगा..

वृक्ष से श्रृंगार करदो सींचदो जल से धरा..

लौटाये शान गांव की करदे वही हरा भरा..

जोहड, पोखर तक पहाडो से जो पानी आयेगा..

देखना भूजल का स्तर भूमि मे बढ जायेगा..

कब्जे पुराने सब हटादो धार्मिक स्थान से..

बेईमानी छोड बस ये काम हो ईमान से..

देखना प्रयास से अंधकार सब छट जायेगा..

"धीर" का वादा समय फिर लौट कर वो आयेगा....


लेखक 

धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

9414333130

Monday, June 5, 2023

मंजीरे से ढोल हो गये..

मंजीरे से ढोल हो गये..

चपटे थे अब गोल हो गये..

जो गुजरे वो पल अब सारे..

मेरे लिये अनमोल हो गये..

पप्पल से अब धीर हो गये..

पहले से गंभीर हो गये..

उलझे जालों से यूं सुलझे..

बस कांटों से तीर हो गये..

लम्बे जीवन के अनुभव मे..

दुधारी शमशीर हो गये..

जो आंखों के आंचल मे छिप..

रो ना सके वो नीर हो गये..

कही छलावा, कही द्वेष था..

कही निन्दा के खेल हो गये..

कही मिले दिल खोलके सारे..

कही कही बेमेल हो गये..

कही बने ज्ञानी हठ योगी..

कही गधे बेप्रीत हो गये..

कोई ठुकरा गया निवेदन..

कही किसी के मीत हो गये..

दिलवालों की इस दुनियां मे

दिल सारे बेमेल हो गये..

हम समझे ये रीत जगत की..

बस इतने मे खेल हो गये..

रिश्ते जकडे स्वार्थ पकडे..

स्यापा समझ के पार हो गये..

भाई खारे लगे नमक से..

दुश्मन सारे यार हो गये..

रीत जगत की देख ये सारी..

"धीर" अक्ल खामोश हो गये..

उछल कूद सब धरी रह ग‌ई..

ठण्डे सारे जोश हो गये..


#भूली_बिसरी_यांदें

Saturday, May 20, 2023

फनकार नहीं फन कार है ये...

 आस्तीन के सांप ना पालों सुचिता सपट पिटारों मे..

इनकी गिनती होती आई लोमड, काग, सियारों मे..

जिस थाली मे खाते है उसमे ही छेद बनाता है..

हम भाई भाई करते है, पीछे से दांव लगाता है..

कुत्तों को ज्यो घृत, गधों को महल नहीं पच पाता है..

चमगादड़ के सर पर जैसे फूल नहीं सज पाता है..

बोलो सेकुलर जालों से कब तक बहलाते जाओगे..

बोलो भाईचारे की कीमत तुम देकर जान चुकाओंगे..

कुछ तो सीख लिया होता अपने इतिहास पुराने से..

कुछ तो सबक लिया होता, पद्मावती, राणा, सांगों से..

ये छदम भेष मे छुपे हुऐ बहुरंगी सांप सपोले है..

ये लाख बहादुर बनते हो लेकिन कद मे बस बौने है..

ये छदम, छलावा, कपट, जाल‌ मे रंगे रहे जेहादी है..

अपनी बहनों संग विवाह रचे, झुठे बस अवसरवादी है..

अब " धीर" समय है कुलषित सब धाराओं का मुख मोडेंगे.

विषधर जहरीले नागों का चुन चुनकर हम फन तोडेंगे..

अब समय नहीं है दुष्टों को अपने अनुष्ठान बुलाने का..

फनकार नहीं फन कार है ये, इनको सत्कार दिलाने का..

अब उठो, जगो, ऐलान करो, कुत्तों से प्रीत नहीं होगी..

जगराते, किर्तन, चौकी मे  पिछली कोई रीत नहीं होगी..

तुम पांच वक्त के नामाजी अल्लाह के प्यारे बने रहो..

उनको ही पेश करों नगमे उनके ही तारे बने रहो..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

Sunday, April 30, 2023

आंखों‌‌ की मक्कारी देख...

मैने हरदम आंखे खोली, आंखों की मक्कारी देख..

बचपन से मै बडा हुआ हूं कितनी दुनियादारी देख..

मैने बचपन काटा हरदम संघर्षों की गोदी मे..

बीत ग‌ई है मेरी जवानी दुनियां की हुशियारी देख..

मेरी हस्ती बस मेरी है, मेरा रुतबा मेरी शाख..

मैने हरदम सीखा है बस लोगों की खुद्दारी देख..

पुरखो की जो बेच जमीने आज गर्व‌ से फूले है..

वो संघर्ष भला क्या जाने पला है जो अय्यारी देख..

आज दे रहे ज्ञान जिन्हें हम कल तक समझाते आये..

"धीर" हंसी आती है मुझको यारों की गद्दारी देख..

सत्ता पाने को दुर्योधन पल पल‌ पासे चलता है..

सम्भल गया हूं देख यहां शकुनी से कुशल जुआरी देख..

Saturday, April 29, 2023

तरकश से तीर, शब्द जुबा़नो से फिसलकर..

तरकश से तीर, शब्द जुबा़नो से फिसलकर..

आते नहीं है लौटकर बेगाने समझकर..

द्रोपद सुता के शब्द से महायुद्ध था रचा..

निकले जो दोनों आयेगे परिपाटी बदलकर..

काबू मे गर हो हौसला तो काबू मे हो जुबा़न..

भूले से भी ना बोलिये बेबाक पलटकर..

शब्दों की मार सह गये वो‌ लोग ओर थे..

बस " धीर" यहां बोलिये अलफाज़ सम्भलकर..

धुंधली सी हो ग‌ई है वो प्रीत की दीवार..

जब से ग‌ई नजाकते शब्दों से निकलकर..

Tuesday, April 11, 2023

आदमी रोज मरता है यहां रिश्ते बचाने मे..

 दरो दरवाजे कब तय करने लगे कद जमाने मे..

अनेकों साल लग जाते है खुद का कद बनाने मे..

खनक चंद रेजगारी की भला क्या हैसियत होगी..

आदमी रोज मरता है यहां  रिश्ते बचाने मे..

कोई पद तो कोई ऐठा है पैसों की रिवायत मे..

आदमी टूट जाता है यार अच्छे कमाने मे..

जहर थोडा ही बहुत है निसारे जान करने को..

जहर हर रोज पीना है यहां जीवन बिताने मे..

तराजू लेके बैठे है व्यापारी तौलते कद को..

"धीर" काबिल नहीं है जो हमे अब आजमाने मे..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है.. इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है.. वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते.. वो मिलते है उनसे ही जिनस...