पढना है तो खुद को पढलों,
मृग मारीचा छोड जरा..
सब दुनियां की भूल भुलैयां
कौन है खोटा कौन खरा..
मतलब के मोहजाल निगलते
सम्बंधों की परिपाटी..
उजियारों को नजर लगी है
अंधिकारों से जगत भरा..
"धीर"
Post a Comment
झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे.. कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे.. रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हुई जिम्मेदारी.. ...
No comments:
Post a Comment