पढना है तो खुद को पढलों,
मृग मारीचा छोड जरा..
सब दुनियां की भूल भुलैयां
कौन है खोटा कौन खरा..
मतलब के मोहजाल निगलते
सम्बंधों की परिपाटी..
उजियारों को नजर लगी है
अंधिकारों से जगत भरा..
"धीर"
असर खानदानी, दिखा रहे है गधे शेर खुद को, बता रहे है जिन्हें पाला पोसा खिलाया निवाला औकात अपनी वो जता रहे है वहम के जो पर्दे पडे थे अक्ल पर ...
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