दूसरों के कद पे लहजा यूं लगाना छोड दे
बेवक्त ही गिर जायेगा यूं डगमगाना छोड दे
चाहे थोडी रख मगर पहचान अपनी चाहिये
अपने चेहरे पर यूं चेहरा अब लगाना छोड दे
"धीर"
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झूठ यहां हर रोज बिकेंगे, सत्ता के अखबारों मे.. कलम जहां सजदा करती हो, सरकारी दरबारों मे.. रेंग रही है न्याय पद्धति, मौन हुई जिम्मेदारी.. ...
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