Thursday, May 14, 2026
अब रिश्तों मे पहले जैसी बात नहीं है...
Saturday, January 17, 2026
कटती गऊए तुम्हे पुकारे
गौवंश के हालातो पर गौ वंश की पुकार.....
तर्ज़ : कस्मे वादे प्यार वफा सब
कटती गऊए तुम्हे पुकारे श्याम सलौने आओ रे
संकट में गौ वंश गोपाला आकर जान बचाओ रे
कटती ,,,,,,,,,
मूक हूँ मैं क्या बोलू तुमसे, तुम घट-घट के वाशी हो
मैं कटती हूँ हर घर कोने, चाहे अयोध्या कांशी हो
है विस्वाश की सुन लोगे प्रभु, ना विस्वाश उठाओ रे
कटती ,,,,,,,,,,,
घुट - घुट कर सांसो में मेरा रुदन तड़फता रहता है
अपनों की दुत्कार से पीड़ित हृदय सिसकता रहता है
कब तक मौन रहोंगे कान्हा, अब ना देर लगाओ रे
कटती ,,,,,,,,,
गर्दन पर आरी से पहले, कितना मुझे सताते है
लाल रहे ये गोस्त हमारा, चमड़ी नरम बनाते है
पानी की हो गर्म बौछारें , ना इतना तड़फाओ रे
कटती ,,,,,,,,,,,
अब हृदय में,, धीर,, नहीं, गंभीर तुम्हे होना होगा
हिन्दू है गर खून से तो शमशीर तुम्हे होना होगा
गौ हत्यारों को बस फांसी ये कानून बनाओ रे
कटती ,,,,,,,,
Monday, January 12, 2026
Sunday, December 21, 2025
मै हूं अरावली सुनों मेरी..
मै मात्र नहीं पाषाण सुनो, मै हृदय धरा की धारा हूं..
मै मात्र नहीं पर्वतमाला, जनमानस की विस्तारा हूं..
मै हूं अरावली सुनों मेरी, मै आज सुनाने आई हूं..
हर काल खण्ड की गवाह हूं मै, ये तुम्हें बताने आई हूं..
मुझमें कितने ही वन, उपवन, मुझमें कितनी सरीता बहती..
कितने ही युद्ध हुऐ मुझमे, कितनी ही मै पीडा सहती..
कभी खनन, कभी भूचालो मे, कभी वर्षा कभी अधंकारो मे..
मैने खोया अपना स्वरुप, मानववृति अधिकारों में..
हर काल ने मुझको छला बहुत, उन्मुक्त विचारों ने मारा..
यहां बडे ख्यालों के छोटे, नेता, मक्कारों ने मारा..
मै वहीं अरावली सुनो जरा कितनों की जान बचाती हूं..
प्रचंड हवा के वेग चले मै ढाल खडी बन जाती हूं..
वर्षा जल की कलकल हो या, बहते झरनों की मधुर धारा..
झीलों का हूं ठहराव तो मै लाखों नदियों की विस्तारा..
राणा, सांगा, पृथ्वी, राठौड इन वीरों का इतिहास हूं मै..
मीरा, कर्मा की भक्ति तो मां पन्ना का बलिदान हूं मै..
रानी पदमनी, हाडा रानी लाखों जौहर का मान हूं मै..
दिल्ली, हरियाणा, गुजरात तो पावन राजस्थान हूं मै..
छोटी छोटी सी चोटी से, मै गुरु शिखर सा विशाल भी हूं..
मै घाटी और पठारों का, मनमोहक सुन्दर भाल भी हूं..
कैसे कद नापोगे मेरा, कितने हथियार चलाओंगे..
अस्तित्व मेरा ना शेष रहे, कितने कानून बनाओंगे..
पर यांद रखों इतना दुष्टों, मै पत्थर भर विस्तार नहीं..
तुम जैसे लाखों चले गये, पर मिटा मेरा आकार नहीं..
मै जिसदिन अपनी चीखों से खुद को आवाज लगाऊंगी..
कानून तुम्हारे पास रखों, मै खडी खडी इतराऊगी..
मेरे लाखों बेटे मुझपर, एक आंच नहीं आने देंगे..
अब धीर कटे चाहे ये सर, पर लाज नहीं जाने देंगे..
Saturday, November 1, 2025
दोस्तों के कारनामें देखकर
दोस्तों के कारनामें देखकर
दुश्मनों से दिललगी सी हो गई..
कौन है अपना इसी तलाश मे
खर्च सारी जिन्दगी सी हो गई..
उस दवा पर हो भला कैसा यकीं
जख्म जो देती है उम्र भर का..
अब मेरी है विषधरों से दोस्ती
विषधरों से बंदगी सी हो गई..
उन उजालों का भला मै क्या करु
जो सदा चुभते रहे इन आंखों मे..
घुप अंधेरो ने मिटाई तिशनगी
स्याह राते हमनशी सी हो गई है..
शहर के हाकिम ही थे शातिर बडे
मर्ज से हटकर दवा देते रहे..
था यकीं तो "धीर" बस इक मौत पर
जिन्दगी तो बेबसी सी हो गई है..
Thursday, October 30, 2025
कण्ठ से शंकर जो नीले हो गये थे शिव मेरे
अमृत की खोज मे विषपान का उल्लेख है
जो गरल को पी गया समझो वही तो श्रेष्ठ है
सागर मथन से क्या मिला एक बार जानलो जरा
अमृत तो बस कलश मे था आगाध था जो विष भरा
ओर भी सुन्दर सजीले हो गये थे शिव मेरे
कण्ठ से शंकर जो नीले हो गये थे शिव मेरे
दूसरे के कष्ट को महसूस जो दिल से करे..
है सिद्ध से भी सिद्धतम उपकार जो सबपर करे..
जो किसी की देख पीडा, किंचित विचलित हो गया..
आंख के हर आंशुओं, पीडाओं मे जो बह गया..
मानलो वो ही तो शिव है, मन शिवालय हो गया..
धीर वो महादेव है बस जो गरल को पी गया
Monday, July 21, 2025
सीढियां जो भी लगी थी, कामयाबी दौर मे..
सीढियां जो भी लगी थी, कामयाबी दौर मे..
बस बचाकर उनको रखलो डूबती हर भौर मे..
जब बुलंदी का सितारा डूबने पर आयेगा..
काम आयेगी तेरे एक हमसफर के तौर पे..
कुछ बुलंदी देख ठोकर से गिरादे सीढियां..
गिरते है सीधे फलक से कौसती है पीढियां..
कांधों पर जिनके तेरी हर सुर्खियों का बोझ था..
तेरी शोहरत से ही जिनके चेहरे भर पर ओज था..
आज वो तुझको भले ही अदने से आये नज़र..
जिनकी राहों से लिपट तू पार करता हर डगर..
देखना एक रोज शोहरत खाक मे मिल जायेगी..
जिन्दगी जब लौट के वापस वही पर आयेगी..
ढूंढता रह जायेगा तू मुफलसी के हर वो पल..
बस अकेला पायेगा होकर जमाने मे विफल..
शोहरतों के दौरे मद मे जिनको ठुकराता गया..
खोके सारी सीढियां हर साख तू पाता गया..
लेकिन बचा के गर जो रखता सीढियां उस दौर की..
काम आती अब तेरे वो पीढियां उस दौर की..
जीन्दगी के चक्र मे पाकर सवेरा खो गया..
भूल ढलती सांझ को वो बस रंगीला हो गया..
"धीर" सुख दुःख का तकाजा किस्मती अहसास है..
जीत उसकी है सदा अपने जो आसपास है..
Thursday, July 3, 2025
हमने अक्सर चोटे खाई
हमने अक्सर चोटे खाई, अपने ही रखवालों से..
गले लगाकर खूब दुलारा, मिला जो मतलब वालों से..
खुदगर्जी के पेड घने है, जंगल द्वेष विकारों का..
बोलों कैसे खुद को बचाता, चुभते रोज सवालों से..
अब चंदन भी हुआ विषैला, लिपटे काल भुजंगो से..
कैसे सच लडता झूठों से, हार गया नक्कालों से..
सर शैया पर भिष्म पडे है, चाल शिखंडी चलते है..
महाभारत का रण सृजित है इन्द्रप्रस्थ मोहजालों से..
वीरों की महफिल मे अक्सर चीर हरण हो जाते है..
अभिमन्यु बलिदान हुऐ है, राजनीतिक हर चालों से..
हर युग के प्रतिमानों पर जयचंदो की गद्दारी है..
कितने अकबर मारे जाते महाराणा के भालों से..
खामोशी की पगडंडी पर " धीर" गजब कोलाहल है..
मौन स्वीकृति की उलझन मे, मै उलझा हूं सालों से..
Friday, June 20, 2025
आंसू
आंख से बहते हर आंसू, मन की पीडा हर लेते है..
बस शब्दों का मौन है रहता, बाकी सब कह लेते है..
जब से सफल हुऐ है अपने, मानों कोसो दूर हुऐ..
मेरे आंसू बस मेरे है, मेरे संग ही बह लेते है..
अंतर्मन का बनके आईना, साथ निभाते जीवन भर..
मेरे हर गम और खुशियों को, आत्मसात सा कर लेते है..
नहीं शिकायत ना कोई शिकवा,ना द्वेष तुमसे,ना ही गिला है..
बस एक तुमसे हमारी यारी, तुम्हीं से दिल की कह लेते है..
टपक ना जाये ये व्यर्थ आंसू, है धीर इतना ख्याल मुझको..
कसम तुम्हारे लिये जिगर पर, जमाने भर की सह लेते है..
Thursday, June 19, 2025
मतलबी लोग है मतलब का सहारा साथी..
किससे करते हो वफा कौन तुम्हारा साथी..
मतलबी लोग है मतलब का सहारा साथी..
बहते दरियां कभी कतरा नहीं हुआ करते..
डूबते शख्स को दे कौन किनारा साथी..
रात उम्मीद है कल तो सवेरा आयेगा..
गर्दिशे दौर मे कैसे हो गुजारा साथी...
उंगलियां रेत के एक ढेर पर यूं चलने लगी...
आशियां शहर मे हो एक हमारा साथी..
अपनी खुशियों को ना परवाज दे जमाने में..
काट लेता है यहां पंख जमाना साथी..
आज खामोश है जो वक्त पर बोले ही नहीं..
मेरी आवाज कहां उनको गवारा साथी..
अपनी मंजिल है कहां "धीर" ठिकाना पूछो..
नज़र से दूर है हर एक नजारा साथी...
Wednesday, January 1, 2025
पश्चिमी नववर्ष का आभास कैसा ?
हाकिम जी सुनो...
हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है.. इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है.. वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते.. वो मिलते है उनसे ही जिनस...
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वो मयखाने के पैमाने में सब खुशिया लुटा बैठा भरी मांगे,खनकती,चूडिया, बिंदिया लुटा बैठ...
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दोस्तों के कारनामें देखकर दुश्मनों से दिललगी सी हो गई.. कौन है अपना इसी तलाश मे खर्च सारी जिन्दगी सी हो गई.. उस दवा पर हो भला कैसा यकीं ...









