Monday, March 27, 2023

हां मैने कश्मीर का मंजर देखा है...

लुटती धरती लुटता अम्बर देखा है...

हा मैने कश्मीर का मंजर देखा है...


एक विशेष धर्म के ठेकेदारों ने...

जहर भरा मस्जिद की चार मिनारों ने..

अमन चैन की बाते अक्सर होती थी..

दर्द हुआ सीता को सलमा रोती थी..

जलती बस्ती,और पलायन देखा है...

हा मैने......


यार मेरा अख्तर बचपन का साथी था...

आज बना वो भीड, बडा उन्मादी था...

बीना, ममता, शारदा रोती देखी है...

वहशी के हाथों सब खोती देखी है...

हर चेहरे शैतान को अंदर देखा है...

हा मैने ....


धरती पर जब स्वर्ग नरक बन जाता है...

हर शै पर बस खौफ का झौका आता है...

घाटी मे था शोर धर्म के अंधो का...

कहते खुद को पाक जिगर के गंदो का...

आंखों मे नापाक समुद्र देखा है...

हा मैने...


कल तक जो कश्मीर हमारा होता था..

रहते थे बेखौफ जमाना होता था..

छीन लिया अब चैन जिहादी नारों ने..

दहशतगर्दी फैलाते अखबारों ने..

बहती आंखे, सूना अम्बर देखा है..

हा मैने …


जिन्हें पढाया बापू ने हुशियारी से..

आहत है अब चेलों की गद्दारी से..

घर मे चेले घात लगाते देखे है..

बंदूकों से घाव लगाते देखे है..

पकडे हर एक हाथ को खंजर देखा है...

हा मैने ....


शासन ओर प्रशासन सब खामोश रहे..

कटते हिन्दु देख के सब मदहोश रहे..

कत्लेआम मचा था स्वर्ग सी घाटी मे..

ढेरों कातिल झूम‌ रहे आबादी मे…

मानव ओर जल्लाद का अंतर देखा है...

हा मैने....


कर दुष्कर्म बदन को काटा आरों से..

चीखे दब ग‌ई जिहादी सब नारों से..

चौबीस लाशों पर हंसते और गातों को..

हा मैने देखा है उन जल्लादों को..

लाशो के ढेरों पर क्रंदन देखा है…

हा मैने….


लाखों मन्दिर तोडे, तोडी यज्ञशाला…

मस्जिद की आवाज पे तोडा गुरुद्वारा..

लाखों की श्रद्धा सम्मान को तोड दिया..

हिन्दु मुस्लिम एक भ्रम‌ को तोड दिया..

धर्म पे बंटती मानवता को देखा है…

हा मैने….


बेटी को ब्याहने के सपने टूट गये…

कुछ ऐसे थे हमसे अपने छूट गये…

कल तक जिनके काफी मौज बहारे थी..

अब शिविरों के कटती रात सहारे थी..

मरती भूख सिसकता बचपन देखा है..

हा मैने…


सेकुलर सोचों ने देश लुटाया है..

शिक्षित कुछ लोगों ने सच छुपाया है..

आतंकी अकबर को खुदा सा दिखलाया..

भगत सिंह, सुखदेव को गुण्डा बतलाया..

यासीन से गद्दार की खिदमत देखा है..

हा मैने…


जो हमलावर को भी महान बताते हो..

सांगा, प्रताप, शिवा इतिहास छुपाते हो..

जिनको हिन्दु असहिषूण से लगते है..

सनातनी जिनकी आंखों मे चुभते है..

सालो उस सरकार का बंधन देखा है..

हा मैने....


इतने जख्म लगे है क्या दिखलाऊ मै..

सारे मंजर यांद है क्या बतलाऊ मै..

अब्बा, भाईजानों से धोखा खाया है..

ना जाने कितनों को मैने गवाया है..

टोपी पर विस्वास को जर्जर देखा है...

हा मैने...


सोये लाखों है मै उन्हे जगाता हूं...

क्या बिती है हमपर यांद दिलाता हूं...

जातिवाद मे बंटे रहे हम‌ सालों से..

बणिया, ठाकर, दलित, ब्राह्मणी जालों से..

हर हिन्दु को‌ कौम पे पिटते देखा है...

हा मैने....


बोलो किस किस ने पुरस्कार लौटाये थे..

जब कश्मीर मे जिहादी बौराये थे…

लाखों हिन्दु छोड स्वर्ग को चले गये…

वो अपने ही देश मे ऐसे छले गये…

मैने छलकते आंसु मे गम देखा है…


अब भी समय है " धीर" धर्म को जानलो तुम..

सनातनी  कर्त्तव्यों को पहचान लो तुम..

हिन्दु है बस हिन्दुस्तान हमारा है..

छोडो जातीवाद हमारा नारा है..

जाती पर बंटते हिन्दुत्व को देखा है..

हा मैने....

Wednesday, March 15, 2023

रंग ले सदभाव का....

 चंद बच्चों को हंसाकर रंग खुशियां बांटकर..

नफरतों की सख्त सारी बेडियों को काटकर..

रंग ले सदभाव का हर ओर बढता मै गया..

मूर्ति मनभाव की हर ओर गढता मै गयां..

मै स्नेह के रंग से हर नफरतों को रंग गया...

जिस तरफ देखी मौहब्त मै उसी के संग गया.. 

स्याह काले रंग से कूछ खेलते होली मिले..

कुछ गुलाबी रंग मे लिपटे से हमजोली मिले..

कुल सुर्ख रंगों से मानो लाल सब‌ करने लगे..

कुछ हरे रंगो से रंग यहां मजहबी भरने लगे..

लेके भगवा रंग कुछ यहां धर्म सिखलाने लगे..

रंग की अपनी फिजा, क्या रंग बतलाने लगे..

जो कभी हरियाली था अब‌ मजहबी होने लगा..

शौर्य का प्रतीक भगवा धर्म मे खोने लगा..

शांति का प्रतीक बन जो धवल कौमी शान था..

अब धवल भी धर्म की होने लगा पहचान था..

एक डण्डा बच गया बस काम इसको लीजिये..

जो धर्म से जोडे रंग को एक दो धर दिजिये..

रंग तो बस रंग‌ है क्यों मजहबी इसे कीजिये ...

होली पर रंगों को भी खुलकर आजादी दिजिये..

रंग को अब " धीर" मजहब से जुदा कर दिजिये..

हर रंग भी कहता है कुछ‌ बस गौर से सुन लिजिये..

Thursday, February 23, 2023

बस मां का दूध लजाते है

 जब सामाजिक सहिष्णुता छलनी होने लगती है,,

सत्ता की अपराधी से जब मिलनी होने लगती,,

जब भारत मे अफजल के भी नारे लगने लगते है,,

पाकिस्तान आबाद रहे जयकारे लगने लगते है,,

जेएनयु  जब गढ बन जाये भारत के गद्दारों का,,

घर घर अफजल निकलेगा इन देशद्रोही नारो का,,

खाते है इस देश का लेकिन पाकिस्तानी लगते है,,

उनके हर जज्बात मुझे बस कारस्तानी लगते है,,

भारत मां के हर आंशु तो तब शर्मसार हो जाते है

जब राहुल कजरी उमर संग मुगली बिरयानी खाते है,,

इससे अच्छा मर जाते वो बस डूब के चुल्लु पानी मे,,

किचिंत भी शर्म नही आई संग गद्दारों के जाने मे,,

जाने कैसी अब नजर लगी संसद के इन गलियारों को,,

इशरत बेटी सी लगती है इन खाकी के मक्कारो को,,

इतना सुनले जो भारत की पावनता को गिरराते है,,

दिन रात जो घृणित कृत्यों से बस मां का दूध लजाते है,,

गर घर घर से अफजल निकला तो दर दर जूत लगायेगे,,

बकरो की इन औलादों को हम सिहं का मूत पिलायेगे,,

ये "धीर" राम का सेवक है कण कण मे राम समाता है,,

यमलोक दिखादो झट उनको जो भारत पर गुर्राता है,,

धीरेन्द्र गुप्ता"धीर"


Tuesday, February 14, 2023

अपना बना ले कोई

आज की रात मेरा दर्द चुरा‌ ले कोई..

चंद लम्हों के लिये अपना बनाले कोई..

तीर हूं लौट के तरकश मे नहीं आऊंगा..

मै नजर मे हूं निशाना तो लगाले कोई..

राख हूं, खाक हूं, उम्मीद हूं एक टूटी हुई..

मै संवर जाऊंगा ख्वाबों मे सजाले कोई..

तेरी खुश्बु मेरी यांदों से क्यो नही जाती..

जैसे अहसास हवाओं का बहा ले कोई..

बेडा दरियां के किनारों पे डूबा बैठे हम..

बैठे जिस डाल पे आरी‌ यूं चलाले कोई..

मेरा मुर्शिद ही मेरी जान का दुश्मन निकला..

बडी आफत मे पडी जान बचाले कोई..

"धीर" कौडी मे बिके लाख मे बिकने वाले..

जैसे हस्ती सरेबाजार मिटाले कोई..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

खंज़र भी साथ रखते है..

 दोगले लोग है बातों मे बात रखते है..

गले मिलते है तो खंजर भी साथ रखते है..

सुना है शहर की गलियां भी तंग होने लगी..

फासले दरमियां ही आस पास रखते है..

बिमार था मुझे दवा की जगह जख्म दिये..

यार कुछ ऐसे भी जिगरी है खास रखते है..

खैरियत पूछते है‌ दर्द ही देने वाले..

काले दिल है जुबानी मिठास रखते है..

मेरी तलाश मे हमराज ही मेरा निकला..

छुपा के दिल मे हजारों ही राज रखते है..

कैसे पहचानता फितरत छुपे नकाबों की..

इतने शातिर है की बदली आवाज रखते है..

मृगमारीच मे फंसकर बडे हैरान से है..

"धीर" उलझन मे भी होशो हवास रखते है..

दीपावली विशेष

हृदय के दीप मे सदभाव की ज्योति जगा लेना..

दीवाली प्रेम और मृदभाव‌ से मिलकर मना लेना..

तल्ख सम्बन्ध से जुडती कहां है प्रीत की डोरी..

गजब मौका है अपने रुठे हो उनको मना लेना..

अहम से दूर रहकर संगठित परिवार सारा हो..

यहां बिखरे हुऐ रिश्तों की बस माला सजा लेना..

यहां अज्ञानताओं का घटाघुप‌ सा अंधेरा है..

दीप आशाओं का लेकर अंधेरे मे जला लेना..

स्याह रातों की दहरी पर उजाले की जो हो दस्तक..

किसी रोते के आंशु पोछ घर अपना सजा लेना..

शकून मिलेगा इबादत सा जरा कर देखों..

किसी रोते हुऐ को " धीर" पल दो पल हंसा लेना...


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

छूट जाते है...

मेरी पूजा के हर सौपान 

मुझसे छूठ जाते है..

मेरी आगाध श्रद्धा पात्र 

अक्सर रुठ जाते है..

समझ मुझको नहीं आता 

मै मन्दिर देव क्या बदलू..

स्वप्न सुन्दर सजीले आ 

धरातल टूट जाते है..

भंवर मे डूबती नैया का

 जो पतवार से नाता..

अगर विस्वास चोटिल हो 

किनारे डूब जाते है..

मेरा हाकिम ही मेरे मर्ज 

का बनकर सबब आया..

दवा देना बिमारे मर्ज 

को जो भूल जाते है..

झुकाते सर रहे सजदे मे 

जिस दातार के आगे..

गुनाह अपने सभी कर्मों 

के वो कबूल जाते है..

मेरा साया ही दुश्मन बनके

 मेरे साथ चलता है..

मुहाफिज ही यहां पर 

आबरु को लूट जाते है..

मुझे बस "धीर" उन 

परछाईयों से डर सा लगता है..

जख्म यांदों के झरने 

आंख से जो फूट जाते है..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

कोई बख्शीश देती है...

 आईनों पर सजी धूले ,लकीरे खींच देती है..

ज्यो बंजर खेत को ,बारिश की बूंदे सींच देती है..

यहां है तलखिया इतनी की ,दिल मिलने नहीं देती..

लगे हर जख्म पर चोटे, हजारों टीस देती है..

मरहम लेकर वो आया, रहनुमा कुछ इस तरह घर मे..

तवायफ कोठे पर जैसे , कोई बख्शीस देती है..

वो मेरे साथ रहता था‌ मेरा , बनकर वो हमसाया..

दुष्ट शुकुनी की ये चाले, ही अक्सर सीख देती है..

बदलते दौर मे खुद को ,  बुलंद करले जो जीना है..

मदद की बानगी ऐसी की , जैसे भीख देती है..

यहां जो यारी है उनसे ही , बस खुद को बचाना है..

बढा कर हाथ अक्सर जो, मदद का खींच देती है..

उजाले तक ही साया साथ, देता है सफर सुनले..

ये जीवन पाठशाला ही, सबक बस "धीर" देती है


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

गवाही कौन देता है

बदलते वक्त मे चीजें ,पुरानी कौन देता हैं..

जो मुद्दें खाक है उनको, कहानी कौन देता हैं..

मुकदमे कब सुलझते है,अदालत की तहरीरों में..

यहां सच्चें मुकदमों में ,गवाही कौन देता हैं..

शहर की तंग गलियों मे ,बसावट देख पुरखों की..

खण्डहर होती इमारत को ,जवानी कौन देता हैं..

रहीसी देख हाकिम की, शहर के शख्स है हैरान..

गर्त मे डूबे बेडे को, किनारे कौन देता हैं..

जो मुफलिस थे तो अक्सर ,ही सहारे खूब मिलते थे..

बदलते वक्त पर सम्भलें ,सहारा कौन देता हैं..

आईना अब कहां सूरत ,दिखाता है असल जैसी..

दिखावे के चढे रंगों को , वाणी कौन देता है..

रेत पर डाल कर मछली, मजा लेते है जी भरकर..

तडफते " धीर" को सहरा ,मे पानी कौन देता है..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

छीन लेता है...

जमाना हर खुशी ओ साज ,अक्सर छीन लेता है..

हंसी लब की शकु दिल का, नजारा छीन लेता है..

रवायत है अनोखी और ,चलन भी है बेगैरत सा..

वो शातिर इतना है आंखे ,ईशारे छीन लेता है..

धडकते दिल से वो बेधडक,और महफूज है कितना..

यहां हर देव पत्थर का, मिनारे छीन लेता है..

बिलखती भूख रोते पेट की,बस दास्ता इतनी..

तडफता रुदन शासन से ,सिहांसन छीन लेता है..

यहां कानून की जद मे ,सितम सरकार करती है..

दिवारों पर लिखा फतवा ,निवाला छीन लेता है..

जिन्हें चुनकर मुल्क ने ,अपना रहनूमा बनाया था..

वो बनके रहनुमा छत ,ओर साया छीन लेता है..

यहां अब " धीर" मतलब से ,तुम्हारी मेरी यारी है..

खुदा भी मौत देकर अब ,मजारे छीन लेता है..


धीरेन्द्र गुप्ता " धीर"

भ्रम पाल कर बैठे है..

कुछ वहम हुआ है अदनों को, वो भ्रम पाल कर बैठे है...

पतझड के चलन देख माली , क्यो दर्ख पाल कर बैठे है..

किरदारों ‌की इस नगरी मे, मुखटों के चलन हजारों है..

उठते जज्बातों के रण मे, हम सब्र पाल कर बैठे है..

जीवनपथ की पगडंडी पर, रिश्तों का खेल अनोखा है..

मांझी टूटी पतवारों पर मांझी, ज्यो दर्प पाल कर बैठे है..

लगडे घोडे पर दांव लगा,  जो रेस जीतना चाहते है..

शातिर वो सकल जुआरी है ,जो कर्ज पाल कर बैठे है..

शकुनि की चालों से खुद को ,कैसे महफूज रखे कोई..

रिश्तों की खोती तपीश देख ,जो बर्फ पाल कर बैठे है..

जो डरते थे विषदंतों से ,अब जहर उगलते देखे है..

मुषक भी " धीर" जमाने में ,अब सर्प पाल कर बैठे है...

हाकिम जी सुनो...

हाकिम है लाजवाब मगर चमचों से घिरे है.. इस दौरे चापलूसी मे दिन किसके फिरे है.. वो देखते उतना ही है जितना ये दिखाते.. वो मिलते है उनसे ही जिनस...