मै मात्र नहीं पाषाण सुनो, मै हृदय धरा की धारा हूं..
मै मात्र नहीं पर्वतमाला, जनमानस की विस्तारा हूं..
मै हूं अरावली सुनों मेरी, मै आज सुनाने आई हूं..
हर काल खण्ड की गवाह हूं मै, ये तुम्हें बताने आई हूं..
मुझमें कितने ही वन, उपवन, मुझमें कितनी सरीता बहती..
कितने ही युद्ध हुऐ मुझमे, कितनी ही मै पीडा सहती..
कभी खनन, कभी भूचालो मे, कभी वर्षा कभी अधंकारो मे..
मैने खोया अपना स्वरुप, मानववृति अधिकारों में..
हर काल ने मुझको छला बहुत, उन्मुक्त विचारों ने मारा..
यहां बडे ख्यालों के छोटे, नेता, मक्कारों ने मारा..
मै वहीं अरावली सुनो जरा कितनों की जान बचाती हूं..
प्रचंड हवा के वेग चले मै ढाल खडी बन जाती हूं..
वर्षा जल की कलकल हो या, बहते झरनों की मधुर धारा..
झीलों का हूं ठहराव तो मै लाखों नदियों की विस्तारा..
राणा, सांगा, पृथ्वी, राठौड इन वीरों का इतिहास हूं मै..
मीरा, कर्मा की भक्ति तो मां पन्ना का बलिदान हूं मै..
रानी पदमनी, हाडा रानी लाखों जौहर का मान हूं मै..
दिल्ली, हरियाणा, गुजरात तो पावन राजस्थान हूं मै..
छोटी छोटी सी चोटी से, मै गुरु शिखर सा विशाल भी हूं..
मै घाटी और पठारों का, मनमोहक सुन्दर भाल भी हूं..
कैसे कद नापोगे मेरा, कितने हथियार चलाओंगे..
अस्तित्व मेरा ना शेष रहे, कितने कानून बनाओंगे..
पर यांद रखों इतना दुष्टों, मै पत्थर भर विस्तार नहीं..
तुम जैसे लाखों चले गये, पर मिटा मेरा आकार नहीं..
मै जिसदिन अपनी चीखों से खुद को आवाज लगाऊंगी..
कानून तुम्हारे पास रखों, मै खडी खडी इतराऊगी..
मेरे लाखों बेटे मुझपर, एक आंच नहीं आने देंगे..
अब धीर कटे चाहे ये सर, पर लाज नहीं जाने देंगे..
